रक्ताचा रंग


माझ्या रक्ताचा रंग लाल सोडून दुसरा नाही निघाला..

लाख प्रयत्न केले अगदी थांग थांग पछाडले,
पण याचा निपटारा नाही झाला
खंत ऐवढीच आहे माझ्या रक्ताचा रंग लाल सोडून दुसरा कुठलाच नाही निघाला..||धृ||

नाही मला लाख मोह झाला, अरे वाटलं निघावा भगवा नसलाच तर कमीत कमी हिरवा
नाहीच झालं काही तर असेल तो निळा पांढरा वा पिवळा
पण भ्रम निरस झाला आणि माझ्या रक्ताचा रंग लाल सोडून दुसरा कुठलाच नाही निघाला..||१||

किती मारत होतो किल्लकाऱ्या, किती देत होतो आरोळ्या,
कुठे ऐकु येत होते दिन दिन, कुठे हर हर महादेव प्यारा,
आंतरीक ओढ होती नामांची, हातात समशेर होती यवनांची,
वार चुकवीत शोधत होतो कुठल्याना कुठल्या रंगात मिळेल आसरा..
लाख झुंजलो, लढलो थकलो पण याही आशेचा अंत झाला
आणि माझ्या रक्ताचा रंग लाल सोडून दुसरा कुठलाच नाही निघाला..||२||

समरच होते आयुष्य, कोण आपला कोण परका फरक सारखा पाठी लागला,
कुणाची होती दाढी लांब तर कुणाच्या शेंडीला भलताच अभिमान,
कुणी होते धर्माचे पंडीत कुणी काझी महान,
नसा फोडल्या एक एक करूण सर्वांशी तपासला पण माझ्या रक्ताचा रंग लाल सोडून दुसरा कुठलाच नाही निघाला.||३||

बघत होतो नेसुचा पदर ओरबडतांना पण हातीचा भगवा नाही टेकवता आला,
बोलत होते ओठ जय भवानी पण ‘थांब’ असा पुसटसा आवाजही नाही करता आला
बघत होतो संस्कृतिची नग्नता उघड्या डोळ्यांनी पण मानाचा कापड नाही टाकता आला
सल ऐवढीच आहे, माझ्या रक्ताचा रंग लाल सोडून दुसरा कुठलाच नाही निघाला… || ४||

झाली होती मनाची तृप्ती बहुदा, भासत होते सारे व्यर्थ समिधा,
लढत होते शक्ती शिण यथा तथा, असेल जरी रूप भिन्नता मुळ यांचे एकच सर्वदा,
मनाला आता दृष्टांत झाला आणि माझ्या रक्ताचा रंग फक्त आणि फक्त लाल निघाला..||५||

सौरभ घनश्याम कावळे…

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वेडी च जाहले मी

स्वप्नात पाहिले मी
हृदयात लिहिले मी
प्रेमात तुझ्या का वेड्या वेडी च जाहले मी

संथ संथ लाटा
वारा सुसाट धावे
माझ्याच आसवांनी
हे प्रेम गीत गावे

हृदयात झाकते मी
जेव्हा कधी स्वतःच्या
ठोका बने अबोल
श्वासास लाभते वाचा

तू फुल चांदणीचे
मी पाकळी तुझी रे
विश्वास दे मला तू
नकोच चंद्र-तारे

मंदधुंद सुज्ञ प्रीतीचा
सुगंध दरवळावा
या मुक्या कळीचा
तुज अर्थ उमगावा

अशी काय कळेना
चूक झाली काही
आज हाक मारीते मी
तू ऐकलीच नाही

तरी डोळ्यातुनी तुझिया रे
प्रीत पाहते मी
प्रेमात तुझ्या का वेड्या वेडीच जाहले मी……..
प्रेमात तुझ्या का वेड्या वेडीच जाहले मी……

-Rutuja kamlakar Thakur

वहाँ जहाँ सपने बिखरे मिलते हैं

वहाँ जहाँ सपने बिखरे मिलते हैं
एक अजीब सी ख़ामोशी है

क्यूंकि दुनिया के आगे सब ख़ामोश हो जाते हैं
वहाँ जहाँ सपने बिखरे मिलते हैं
और लफ़्ज़ों की कीमत लगती हैं उस ज़माने की किताब में
जहाँ ख़ामोश हैं मुझ जैसे ही कितने अल्फ़ाज़
दबे हुए, सहमे हुए

क्यूंकि वक़्त से सब पिछड़ ही जाते हैं
वहाँ जहाँ सपने बिखरे मिलते हैं
और थके हुए दिलों को कुचला जाता है उस ज़माने के पैरों तले
जहाँ पहले भी रौंदे गए थे न जाने कितने दिल
सूखे हुए, मुरझाये हुए

क्यूंकि इश्क़ में सब टूट ही जाते हैं
वहाँ जहाँ सपने बिखरे मिलते है
और टूटे दिल की बोली लगती है उस ज़माने की दीवार पे
जहाँ टंगे हुए है मुझ जैसे ही कुछ खोये हुए
भटके हुए, टूटे हुए

क्यूंकि भीड़ में सब खो ही जाते है
वहाँ जहाँ सपने बिखरे मिलते है
और मुसाफिरों के दास्ताँ मिट जाते हैं उस ज़माने के पन्नों से
जहाँ याद रखे जाते हैं बस मुट्ठी भर अफ़साने
तुड़वाये हुए, बिछड़ाये हुए

क्यूंकि अक्सर बिछड़कर सब खो ही जाते हैं
वहाँ जहाँ सपने बिखरे मिलते हैं

– Ronnie Mondal

मुस्कुराते रहिये…

किस्से गैरों के कुछ सुनिए, कुछ वाकये अपने सुनाते रहिये ,
लाख गर्दिशों के दरमियान, किरदार-ए-जहान में मुस्कुराते रहिये  ||

क्या सांझ है, ये सहर क्या, वक़्त पर किसी का ज़ब्त कहाँ ,
दीदार-ए-चाँद का ग़र शौक है, भरी दोपहरी में छत पर जाते रहिये  ||

सरहद, मज़हब, रश्क़, रंजिशें, इन कायदों से ज़रा अंजान हूँ ,
मुस्लिम हैं, तो गीता पढ़िए, ज़रा कुरान हमें सिखलाते रहिये  ||

जो ‘वो’ ख़्वाबों में मिलते हैं, मुक़म्मल नींद ही ख्वाहिश आखिरी ,
ताबीर हसीन ख़्वाबों की, किसी ज़हीन शख़्स से कराते रहिये ||

अशर्फियाँ बयां नहीं करतीं, किसने ता-उमर कमाया क्या ,
मुफ़लिसी खुद पर झेलकर, झुग्गियों में अमीरी लुटाते रहिये  ||

हज़ारों इल्ज़ाम हैं सब पर, कहाँ मुलज़िम क़रार होते सभी ,
क़त्ल करिये बेशक़ शौक़ से, पर मुंसिफ से नज़दीकियां बढ़ाते रहिये  ||

— Abhishek Kumar Mishra
                  

नज़्म : होम क्वारंटाइन

हम हमेशा से कैद में ही रहे,
कैद हमको सदा पसंद आयी!
रूह ने कब भला बगावत की,
जिस्म की कैद से रिहाई की!
जिस्म दुनिया के कैदखाने में,
बड़े मन से बड़ी खुशी से रहा!
मौत आज़ाद करा सकती थी,
इश्क़ लेकिन ज़िन्दगी से रहा!
हमको पीर औ फकीर कहते थे
जिस्म की कैद से निकल जाओ!
शौक की कैद से निकल जाओ,
हुस्न की कैद से निकल जाओ!
और अब क्या नया हुआ आखिर,
कैद का दायरा ही सिमटा है!
हमने दुनिया को घर किया अपना,
अब घर को ही दुनिया करना है!
एक दुनिया है खुद के अंदर भी,
अपने अंदर की कैद में रहिये!
यानी दुनिया में रहने की खातिर,
कुछ नही घर की कैद में रहिये!

— विक्रम शर्मा

दरवाजे पर दिया जलाए बैठा हूँ ….

दरवाजे पर दिया जलाए बैठा हूँ,
मैं पत्थर से उम्मीद लगाए बैठा हूँ।

हा! वो ऐतबार मुझ पर नहीं करता,
मैं ज़िन्दगी को अपनी सताए बैठा हूँ।

इज़हार करने से चाहे मना कर तू,
मैं इश्क़ करने का हक़ कमाए बैठा हूँ।

वो हर कश पर मुझको टोकती थी कभी,
मैं आज ये सीना सुलगाए बैठा हूँ।

वो खुश है अपनी दिल्लगी में ए “वासु”,
मैं शमशान में जिगरा दफ़नाए बैठा हूँ।

  • वासु

“स्मृतियाँ”

स्मृतियों के पटल पर,
जब कभी कुछ खोजता हूँ
क्या बताऊँ किस किस तरह
तुमको ही मैं सोचता हूँमैं हृदय की डायरी में
जब कोई नवगीत लिखता
तुमको पंक्ति आधार रख कर
अपने मन की प्रीत लिखता
शब्दों के मोती पिरोकर
मैं कोई जब छन्द रचता
प्रेम की उत्कृष्ट संज्ञा
जब कभी मैं ढूंढ़ता हूँ
क्या बताऊँ किस किस तरह से
तुमको ही मैं सोचता हूँ

ये तुम्हारे केश कोमल
नेह की छाया बने है
ये तुम्हारे नयन तीखे
रात का काजल बने है
चाँद की सोलह कलाएं
तुमसे ही श्रृंगार पाती
अप्सरा कोई उतरकर
स्वर्ग से आई धरा पर
मैं पुरुरवा, उर्वशी को
तुझमें ही मैं देखता हूँ
क्या बताऊँ किस किस तरह से
तुमको ही मैं सोचता हूँ

स्मृतियों के पटल पर,
जब कभी कुछ खोजता हूँ
क्या बताऊँ किस किस तरह
तुमको ही मैं सोचता हूँ

—आशुतोष जिन्दल

” रामराज्य और modernity “

केवल रामराज्य ही नहीं उससे पहले के भी समाज आज से काफी बेहतर थे। ना केवल सम्पन्नता, शिक्षा और संस्कार में बल्कि Open Minded और Modernity के मामले में भी आज की‌ Generation काफी पीछे है। उस वक्त Casteism का कोई‌ मसला ही नहीं था। माता सीता के पिता द्वारा प्रिय पुत्री के लिए स्वयंवर रचवाना इसका सटीक उदाहरण है। पुरे ब्रह्माण्ड में इसकी सूचना जोरो शोरों से प्रचार प्रसार किया गया‌ होगा। हां धनुष तोडने का Terms and condition जरूर अप्लाई था, राजा जनक की प्रिय लाडली जो ठहरी। लेकिन इस Terms & Conditions में राजा जनक ने कहीं भी वर की सही Income, status, Cast,धर्म आदि जैसी तुच्छ चीजें जानने की कोशिश नहीं की। उस वक्त योग्य वर या योग्य वधु का Definition ही बिल्कुल अलग था। इससे बडा खुला विचारधारा क्या होगा कि राक्षस वर्ग तक के लोगों को भी स्वयंवर ‌में आमंत्रण था। सीता मां आजकल Feminism से अनभिज्ञ थी। आज के‌ generation की‌ माने‌ तो बेवकूफ इतना कौन करता है एक मरद के लिए। विवाह के तुंरत बाद 14 वर्ष वनवास और उसके बाद भी Husband खुद महल का मजा ले रहा है और पत्नी को वापस वन में भेज दिया। सही मायने में आज के अनुसार श्री राम पर दहेज उत्पीड़न Case या Women harassment का Case तो बनता ही था। आपको क्या लगता है राजकुल में पली बढी कन्या सीता जी को Feminism का थ्यौरी नहीं पता होगा? अवश्य पता होगा।‌ अगर आपने रामायण सही से Follow किया होगा तो आपको‌ पता होगा कि मुश्किल समय में श्री राम जी ,मां सीता से Government Policy तक‌ का भी Discuss किया करते थे। Actually सीता मां को राज्य से बाहर निकाले जाने का idea खुद उनका ही था। क्योंकि उस वक्त आजकल का Fake Feminism प्रचलन जो नहीं था।

श्री राम और सीता मां का प्रेम सबसे बेहतरीन प्रेम का उदाहरण वैसे ही थोडे ना माना जाता है। आज की Generation उस प्रेम को नहीं समझ पाएगी। समर्पण, त्याग, साथ निभाना के अलावा भी प्रेम में एक चीज सबसे महत्वपूर्ण होता है एक दुसरे को Understanding करना।‌ जो‌ उनके अंदर थी। वो एक दुसरे को समझते थे। आजकल‌ के Relationship में Understanding कहां रह गयी है? एक समय में दो एक दूसरे के लिए मर मिटने तक की सोचते हैं और दूसरे ही‌ पल में एक दूसरे को गाली गलौज तक पे आ जाते हैं। आजकल प्रेम, प्रेम‌ नहीं होकर स्वार्थ बन चुका है, ….. मतलब बन चुका है। आजकल‌ का‌ प्रेम‌ बहुत कमजोर हो चुका है। असल प्रेम में बहुत Power होता है। Actually स्वयंवर से पहले ही जानकी माता ने प्रभु श्री राम को देखा था। दोनों को पहले‌ नजर में ही प्रेम हो चुका था। वो प्रेम आजकल की प्रेम नहीं थी, जो Situation के‌ अनुसार‌ mood बदल‌‌ लें। उनमें विश्वास था कि वो‌ एक दुसरे को हासिल करेंगे। उनमें इस‌ कदर प्रेम थी कि उस परशुराम धनुष को सभा में इतने महाबलीयों के होने के बावजूद उसे केवल प्रभु श्री राम ही तोड सके। ये वो प्रेम थी जिसने उन्हें मुश्किल क्षणों में उन्हें कठिन से कठिन समस्याओं को सामना करने की शक्ति दी। दर‌असल, सच्चा प्रेम वही तो होता है जो un planned हो , बिना‌ स्वार्थ का हो, जो‌ बिना किसी वजह से हो ,जो बिना हमारे जानकारी का हो। ऐसे प्रेम में Power बहुत होती है…. क्योंकि ऐसे में दो लोगों के उर्जा का Resonance बनाता है। आजकल‌ कहां दिखने को‌ मिलती है ऐसी Resonance वाली प्रेम? बमुश्किल अगर ऐसे दो लोग मिल भी जाएं तो हमारे समाज का System जो है वो उसे आगे नहीं बढने देता। या तो वो पहले ही कहीं‌ High income, status, casteism, religion की बलि चढ जाता है या फिर कहीं आगे बढ भी जाता है तो हमारे खुद के लोग चलने नहीं देते।‌ आजकल रिश्ते बिगडने का सबसे बडा जो Reason

मैंने पाया है वो है परिवार के अन्य सदस्यों का उसमें दखल देना। जो कि उस वक्त में नहीं‌ था। श्री राम का पत्नी को लेकर वनवास जाना उनका Personal matter था , सो उसमें ना ससुराल वालों ने दखल दिया और ना ही घर वालों ने। वहीं श्री लक्ष्मण और उनकी Wife का आपसी निर्णय कुछ और था, सभी परिवार वालों‌ ने उनके निर्णय का स्वागत किया। रावण जैसे दुष्ट की सोच भी हमसे बढकर थी। अपनी बहन सूर्पनखा तक को उसने अपना Life Partner ढूढने का‌ Option दिया था। उसके भी आजकल के वर-वधू वाले Demand नहीं थे। बस बहन को पसंद आ गयी तो आ गयी। बंदा क्या करता है , बंदे का Caste क्या है, बंदे की Status क्या है, बंदे की Degree क्या है? …… कुछ मायने नहीं करता। शूर्पनखा ने Propose भी किया। सो Propose का प्रचलन उसी वक्त का है। हालांकि बाद में दुर्व्यवहार करने लगी जो कि प्रेम के Law के Against था जिसके लिए उसे सजा भुगतनी पडी। आजकल ये Case होता तो समाज दोषी already श्री लक्ष्मण को‌ दोषी करार कर दिया होता, या तो छेडखानी के case में या फिर Rape case में। हालांकि लक्ष्मण थोडे अच्छे Family से Belong करते थे तो case लड सकते थे। फिर भी उनको साबित इत्यादि करने में महीनों लग जाते इतना में उनकी ईज्जत की धज्जियां उड गयी होती। हम उन्हें प्रभु श्री लक्ष्मण नहीं कुछ और बोल रहे होते। In short, यदि रामायण युग अति Modern युग‌ नहीं होता प्रभु श्री राम का पुरा Family दहेज के case में, श्री लक्ष्मण छेडखानी के‌ case में। पुरा का पुरा रामायण का खपोचडा हो गया होता…..

—प्रत्युष भारत

“अमर हूं मैं ..”

दिलों में छुपा हुआ,छोटा सा डर हूँ मैं।
हर पल मरता हुआ, लेकिन अमर हूँ मैं।

पेड़ से टूट कर गिर गया एक पत्ता हूँ मैं।
विश्व विजय कर सकने वाली सत्ता हूँ मैं।

हर पल हार कर, यूँ ही तड़पता हूँ मैं।
आँखों में बसा हुआ, वो बड़ा सा सपना हूँ मैं।

हज़ारों के बीच बैठकर भी एकांत हूँ मैं।
ठंडे समंदर में लहरों की तरह शांत हूँ मैं।

किसी के लिए चलते-चलते कई बार रुका हूँ मैं।
न जाने कितनी बार उसी के लिये बिका हूँ मैं।

किसी के चहरे पर बिखरी हुई शिकन हूँ मैं।
लाशों में लिपटा हुआ वो सफेद कफ़न हूँ मैं।

किसी का वीर, किसी का श्रृंगार हूँ मैं।
बड़े से ब्रह्मांड का छोटा सा सार हूँ मैं।

दिलों में छुपा हुआ,छोटा सा डर हूँ मैं।
हर पल मरता हुआ, लेकिन अमर हूँ मैं।

— आकाश

इंतज़ार मत करो …

वो काफी खूबसूरत थी ।

वो काफी खूबसूरत थी,
दिल के पास थी,
इंतज़ार था,
फिर तनहा सी रात थी ।

एक शाम सा होता है,
सूरज ढल रहा होता है,
रात आने वाली होती है,
अँधेरा पास होने लगता है,
इंतज़ार मत करो ।

बातों में कड़वाहट हो,
दिलों में रंजिश हो,
पर एक कली खिल रही हो,
खिलने दो, नक़्श मिटा दो ।
इंतज़ार मत करो ।

वो आएगा फिर ।

वो आएगा फिर,
तुम साथ बैठोगे फिर,
वो हँसना मुस्कुराना होगा,
वो लड़ना झगड़ना होगा,
वो दोस्ती की बातें होंगी,
इज़हार का बहाना होगा ।
इज़हार कर दो ।
इंतज़ार मत करो ।

झिझक होगी, डर होगा,
सोच होगी, मंज़र होगा,
बिगड़ने का खतरा होगा,
पर सुनहरा सपना होगा,
ज़िक्र करने का दिल होगा,
कह देने का वक़्त होगा ।
कह दो ।
इंतज़ार मत करो ।

वो चला जायेगा ।

वो चला जायेगा,
वो वक़्त रहेगा, वो ख़ास रहेगा,
तुम तन्हा रहोगे जब वो पास रहेगा,
तुम एक रहोगे, वो चार रहेगा,
तुम नदी किनारे, वो पार रहेगा,
इश्क़ रहेगा, वो प्यार रहेगा,
तुम शेर लिखोगे, वो बेकार रहेगा,
तुम ख़ुश्क़ रहोगे, वो गुलज़ार रहेगा,
तुम ख़ामोश रहे, पर वो गुनहग़ार रहेगा ।
वो गुनहग़ार नहीं थी ।
वो खूबसूरत थी,
दिल के पास थी,
इंतज़ार था,
फिर तन्हा रात थी ।

कह दो ।

इंतज़ार मत करो ।

— रॉनी मंडल