” रामराज्य और modernity “

केवल रामराज्य ही नहीं उससे पहले के भी समाज आज से काफी बेहतर थे। ना केवल सम्पन्नता, शिक्षा और संस्कार में बल्कि Open Minded और Modernity के मामले में भी आज की‌ Generation काफी पीछे है। उस वक्त Casteism का कोई‌ मसला ही नहीं था। माता सीता के पिता द्वारा प्रिय पुत्री के लिए स्वयंवर रचवाना इसका सटीक उदाहरण है। पुरे ब्रह्माण्ड में इसकी सूचना जोरो शोरों से प्रचार प्रसार किया गया‌ होगा। हां धनुष तोडने का Terms and condition जरूर अप्लाई था, राजा जनक की प्रिय लाडली जो ठहरी। लेकिन इस Terms & Conditions में राजा जनक ने कहीं भी वर की सही Income, status, Cast,धर्म आदि जैसी तुच्छ चीजें जानने की कोशिश नहीं की। उस वक्त योग्य वर या योग्य वधु का Definition ही बिल्कुल अलग था। इससे बडा खुला विचारधारा क्या होगा कि राक्षस वर्ग तक के लोगों को भी स्वयंवर ‌में आमंत्रण था। सीता मां आजकल Feminism से अनभिज्ञ थी। आज के‌ generation की‌ माने‌ तो बेवकूफ इतना कौन करता है एक मरद के लिए। विवाह के तुंरत बाद 14 वर्ष वनवास और उसके बाद भी Husband खुद महल का मजा ले रहा है और पत्नी को वापस वन में भेज दिया। सही मायने में आज के अनुसार श्री राम पर दहेज उत्पीड़न Case या Women harassment का Case तो बनता ही था। आपको क्या लगता है राजकुल में पली बढी कन्या सीता जी को Feminism का थ्यौरी नहीं पता होगा? अवश्य पता होगा।‌ अगर आपने रामायण सही से Follow किया होगा तो आपको‌ पता होगा कि मुश्किल समय में श्री राम जी ,मां सीता से Government Policy तक‌ का भी Discuss किया करते थे। Actually सीता मां को राज्य से बाहर निकाले जाने का idea खुद उनका ही था। क्योंकि उस वक्त आजकल का Fake Feminism प्रचलन जो नहीं था।

श्री राम और सीता मां का प्रेम सबसे बेहतरीन प्रेम का उदाहरण वैसे ही थोडे ना माना जाता है। आज की Generation उस प्रेम को नहीं समझ पाएगी। समर्पण, त्याग, साथ निभाना के अलावा भी प्रेम में एक चीज सबसे महत्वपूर्ण होता है एक दुसरे को Understanding करना।‌ जो‌ उनके अंदर थी। वो एक दुसरे को समझते थे। आजकल‌ के Relationship में Understanding कहां रह गयी है? एक समय में दो एक दूसरे के लिए मर मिटने तक की सोचते हैं और दूसरे ही‌ पल में एक दूसरे को गाली गलौज तक पे आ जाते हैं। आजकल प्रेम, प्रेम‌ नहीं होकर स्वार्थ बन चुका है, ….. मतलब बन चुका है। आजकल‌ का‌ प्रेम‌ बहुत कमजोर हो चुका है। असल प्रेम में बहुत Power होता है। Actually स्वयंवर से पहले ही जानकी माता ने प्रभु श्री राम को देखा था। दोनों को पहले‌ नजर में ही प्रेम हो चुका था। वो प्रेम आजकल की प्रेम नहीं थी, जो Situation के‌ अनुसार‌ mood बदल‌‌ लें। उनमें विश्वास था कि वो‌ एक दुसरे को हासिल करेंगे। उनमें इस‌ कदर प्रेम थी कि उस परशुराम धनुष को सभा में इतने महाबलीयों के होने के बावजूद उसे केवल प्रभु श्री राम ही तोड सके। ये वो प्रेम थी जिसने उन्हें मुश्किल क्षणों में उन्हें कठिन से कठिन समस्याओं को सामना करने की शक्ति दी। दर‌असल, सच्चा प्रेम वही तो होता है जो un planned हो , बिना‌ स्वार्थ का हो, जो‌ बिना किसी वजह से हो ,जो बिना हमारे जानकारी का हो। ऐसे प्रेम में Power बहुत होती है…. क्योंकि ऐसे में दो लोगों के उर्जा का Resonance बनाता है। आजकल‌ कहां दिखने को‌ मिलती है ऐसी Resonance वाली प्रेम? बमुश्किल अगर ऐसे दो लोग मिल भी जाएं तो हमारे समाज का System जो है वो उसे आगे नहीं बढने देता। या तो वो पहले ही कहीं‌ High income, status, casteism, religion की बलि चढ जाता है या फिर कहीं आगे बढ भी जाता है तो हमारे खुद के लोग चलने नहीं देते।‌ आजकल रिश्ते बिगडने का सबसे बडा जो Reason

मैंने पाया है वो है परिवार के अन्य सदस्यों का उसमें दखल देना। जो कि उस वक्त में नहीं‌ था। श्री राम का पत्नी को लेकर वनवास जाना उनका Personal matter था , सो उसमें ना ससुराल वालों ने दखल दिया और ना ही घर वालों ने। वहीं श्री लक्ष्मण और उनकी Wife का आपसी निर्णय कुछ और था, सभी परिवार वालों‌ ने उनके निर्णय का स्वागत किया। रावण जैसे दुष्ट की सोच भी हमसे बढकर थी। अपनी बहन सूर्पनखा तक को उसने अपना Life Partner ढूढने का‌ Option दिया था। उसके भी आजकल के वर-वधू वाले Demand नहीं थे। बस बहन को पसंद आ गयी तो आ गयी। बंदा क्या करता है , बंदे का Caste क्या है, बंदे की Status क्या है, बंदे की Degree क्या है? …… कुछ मायने नहीं करता। शूर्पनखा ने Propose भी किया। सो Propose का प्रचलन उसी वक्त का है। हालांकि बाद में दुर्व्यवहार करने लगी जो कि प्रेम के Law के Against था जिसके लिए उसे सजा भुगतनी पडी। आजकल ये Case होता तो समाज दोषी already श्री लक्ष्मण को‌ दोषी करार कर दिया होता, या तो छेडखानी के case में या फिर Rape case में। हालांकि लक्ष्मण थोडे अच्छे Family से Belong करते थे तो case लड सकते थे। फिर भी उनको साबित इत्यादि करने में महीनों लग जाते इतना में उनकी ईज्जत की धज्जियां उड गयी होती। हम उन्हें प्रभु श्री लक्ष्मण नहीं कुछ और बोल रहे होते। In short, यदि रामायण युग अति Modern युग‌ नहीं होता प्रभु श्री राम का पुरा Family दहेज के case में, श्री लक्ष्मण छेडखानी के‌ case में। पुरा का पुरा रामायण का खपोचडा हो गया होता…..

—प्रत्युष भारत

“अमर हूं मैं ..”

दिलों में छुपा हुआ,छोटा सा डर हूँ मैं।
हर पल मरता हुआ, लेकिन अमर हूँ मैं।

पेड़ से टूट कर गिर गया एक पत्ता हूँ मैं।
विश्व विजय कर सकने वाली सत्ता हूँ मैं।

हर पल हार कर, यूँ ही तड़पता हूँ मैं।
आँखों में बसा हुआ, वो बड़ा सा सपना हूँ मैं।

हज़ारों के बीच बैठकर भी एकांत हूँ मैं।
ठंडे समंदर में लहरों की तरह शांत हूँ मैं।

किसी के लिए चलते-चलते कई बार रुका हूँ मैं।
न जाने कितनी बार उसी के लिये बिका हूँ मैं।

किसी के चहरे पर बिखरी हुई शिकन हूँ मैं।
लाशों में लिपटा हुआ वो सफेद कफ़न हूँ मैं।

किसी का वीर, किसी का श्रृंगार हूँ मैं।
बड़े से ब्रह्मांड का छोटा सा सार हूँ मैं।

दिलों में छुपा हुआ,छोटा सा डर हूँ मैं।
हर पल मरता हुआ, लेकिन अमर हूँ मैं।

— आकाश

इंतज़ार मत करो …

वो काफी खूबसूरत थी ।

वो काफी खूबसूरत थी,
दिल के पास थी,
इंतज़ार था,
फिर तनहा सी रात थी ।

एक शाम सा होता है,
सूरज ढल रहा होता है,
रात आने वाली होती है,
अँधेरा पास होने लगता है,
इंतज़ार मत करो ।

बातों में कड़वाहट हो,
दिलों में रंजिश हो,
पर एक कली खिल रही हो,
खिलने दो, नक़्श मिटा दो ।
इंतज़ार मत करो ।

वो आएगा फिर ।

वो आएगा फिर,
तुम साथ बैठोगे फिर,
वो हँसना मुस्कुराना होगा,
वो लड़ना झगड़ना होगा,
वो दोस्ती की बातें होंगी,
इज़हार का बहाना होगा ।
इज़हार कर दो ।
इंतज़ार मत करो ।

झिझक होगी, डर होगा,
सोच होगी, मंज़र होगा,
बिगड़ने का खतरा होगा,
पर सुनहरा सपना होगा,
ज़िक्र करने का दिल होगा,
कह देने का वक़्त होगा ।
कह दो ।
इंतज़ार मत करो ।

वो चला जायेगा ।

वो चला जायेगा,
वो वक़्त रहेगा, वो ख़ास रहेगा,
तुम तन्हा रहोगे जब वो पास रहेगा,
तुम एक रहोगे, वो चार रहेगा,
तुम नदी किनारे, वो पार रहेगा,
इश्क़ रहेगा, वो प्यार रहेगा,
तुम शेर लिखोगे, वो बेकार रहेगा,
तुम ख़ुश्क़ रहोगे, वो गुलज़ार रहेगा,
तुम ख़ामोश रहे, पर वो गुनहग़ार रहेगा ।
वो गुनहग़ार नहीं थी ।
वो खूबसूरत थी,
दिल के पास थी,
इंतज़ार था,
फिर तन्हा रात थी ।

कह दो ।

इंतज़ार मत करो ।

— रॉनी मंडल

“दायरें”

कैसे बोले कुछ, पर चुप रह भी नहीं सकते
देखो इस महफिल की रौनक को, यहां कुछ कह भी नहीं सकते
सफेदी भरे अंधेरे में चिमनी का प्रकाश है
आंखों की नमी से, माहौल में बस थोड़ी सी खटास हैं
धुंधलाहट है, खुशबू मेहंदी की
मेरा बसेरा है यही है, यह एक ऐसा घर है जिसकी हर किसी को तलाश है
दर्द की परवाह नहीं है, पर अलगाव का मर्ज है
मेहंदी की नहीं है शायद, एक मुस्कुराहट की अर्ज है
गानों की नहीं, पर मस्ती की तर्ज है
कैसे पीलू घूंट कि सब अच्छा ही है
अंधेरा भले ही है, पर सब सच्चा ही है
चिमनी तो अन्दर भी है चश्मा साफ करके देख
रोशन तो आकाश भी है कमल उतार कर के देख
चलो चलते हैं वहां जहां अनुभव मिलता है
थोड़ी सी मुस्कान से जहां जी भरता है
जहां बातें लंबी होती है रातें नहीं
जहां समय सबके पास है पर फुर्सत नहीं
जहां मेरा नहीं है कुछ, या है कुछ, यकीन नहीं
पाया जहां बहुत कुछ है ,पर कुछ मिला नहीं
पर
सब सही है क्योंकि ना किसी जुगनू की तलाश है,ना किसी मांझी की आस है

–अक्षिता जैन

महक

“ये कहानी महक़ की है, जो पहले मुहल्ले की सबसे चुलबुली लड़की हुआ करती थी । मगर आज जब मैं काफी सालों बाद घर लौटा, तो वो बदल चुकी थी क्योंकि उस लड़की को गांव के कुछ लोगों ने जबरदस्ती औरत बना दिया था ।

जादू भरी सी थी वो,
पल में इठलाती, पल में मचलती ।
सड़क पे चलते चलते
कुछ यूँ ही फिसल जाती ।।

बेआवाज, बेखौफ जिंदगी थी उसकी,
दुनिया को कभी भी ना परखती ।
कभी सहम के बैठ जाती
कभी अचानक से हँस पड़ती ।।

उसकी हंसी किसी को सुनाई ना पड़ती,
वो भी किसी को सुन ना पाती ।
पत्थर पे बैठ आसमान को तकते
ना जाने क्या सोचती रहती ।।

उसे अब किसी से प्रेम न था
अब वो भगवान पे विश्वास भी ना करती ।
वो अब किसी के आने पे ना डरती
बस वो खुद की थी, खुद के साथ ही रहती ।।”

प्रशान्त कुमार चौरसिया

एक ग़म का दरिया है….

एक ग़म का दरिया है और मैं डुबकी लगाता जारहा हूँ।
कुछ इस तरह अपने ज़ख्मों की आग को बुझाता जारहा हूँ।

रौशनाई कम पड़ गयी है क़लम में बिखेरने को
अल्फ़ाज़ों को घसीट कर कांटे चुभाता जारहा हुँ।

यूँही नही कहलाता शायर कोई जहां में
जज़्बातों को पीरो कर मिसरे बनाता जारहा हूँ।

तमन्ना है ज़मीन से आसमान छू लेने की
हालातो की भट्टी में खुद को जलाता जारहा हूँ।

फोजैल अहमद

हम ख़ुद !!

मुंसिफ़ भी ख़ुद, गुनहगार भी ख़ुद ,
कमज़र्फ भी ख़ुद, रसूख़दार भी ख़ुद

कभी बेकार फिरते हैं, कभी कायनात हमसे है ,
मसरूफ़ ज़ुमा हम ख़ुद, फ़िज़ूल इतवार भी ख़ुद ॥

कुछ मांग लूं दर से, या लौट जाऊं हाथ खाली ,
आज आबिद भी ख़ुद, परवरदिगार भी ख़ुद ॥

कहाँ चादर चढ़ा आएं, कहाँ ढूंढें ख़ुदा को हम ,
मक्का मदीना भी ख़ुद, पाक़ मज़ार भी ख़ुद ॥

कहो ख़रीद लूं जहां, कहो नीलाम हो जाऊं ,
मुफ़लिस फ़क़ीर भी ख़ुद, नफ़ीस शहरयार भी ख़ुद ॥

मिज़ाज़-ए-हयात, अब कुछ ठीक नहीं लगता ,
हम हक़ीम भी खुद, बेबस बीमार भी ख़ुद ॥

– अभिषेक कुमार मिष्रा

“बिला उन्वान”

ये हृदय अस्मिता के अस्मिता से सौ बार हारा
एक हठ को ज़ुबाँ के बंद द्वारे फिर पटक मारा

हसरतों की चिता रखकर
उसे ख़ुद ज्वाला दिखाई
आप ही अस्थियाँ चुनकर
उसी से मंदिर बनाई

हमन को तो क्षतचिह्न से उद्धृत नक्शे का सहारा
हमन ने चल उसी पर आँसुओं का काबा निहारा

पीड़ से जोड़ इक माला
उसी बुत पर जा चढ़ाया
फ़ातिहा पढ़ हरे ग़म का
ग़मों को म्लानी बनाया

एक दिन चल दिया ऐकल मिला सागर का किनारा
वो वृद्ध साधु बोला प्रीत की चुन लो पाक धारा

हाथ आई किरण धारा
चुना उसने रंग धानी
प्रीत से प्रीत बुनकर तब
बनी एक मर्म कहानी

जी लिया वो तत्व में परितृप्त जीवन का शरारा
बुझ गये सब नज़ारे बस बचा ये श्यामल नज़ारा

कुमार अंकेश

दो लफ्ज़

अपनी सोच को तहजीब सिखा रहा हूँ,
दो लफ्ज़ लिखने की कोशिश कर रहा हूँ..

युं तो अल्फाजों की बहोत कमी है मेरे पास,
जज्बातों से ही सही
काम चला रहा हूँ..

माना की वो नमक मेरे लिखावट मे नहीं,
पर लफ्ज़ो की मिलावट मेरे फितरत मे भी नहीं..

काश दर्द के भी दुकाने लगतीं इन बाजारों मे,
तो मेरे जैसा सौदागर
इन्हे कहीं मिलता ही नही..

– आसिम मुलानी

सन्नाटा

सन्नाटा चारो ओर छाया हुआ,

खाली ये सुनसान गगन,

साया भी जब शोर करे,

तब थमा है सब यहां।

थम सा गए ये हम,

पर नहीं वो भी,

थम सा गया है सब यहां,

पर वक्त है चलता रहा।

नूर उसकी आखों का यू तेज़,

पर काले बादल अब भी छा ए,

पुकार तो रही थी हर कहीं से वो हमें,

पर सन्नाटे में हम कहा कुछ सुन पाए।

लगाई थी जब उसने पुकार,

कदमों का हुआ शोर विक्रल,

देख तो वो हमे भी रही थी,

पर अंधेरे में हम कहा कुछ देख सके।

देखी जब वो हमे,

तो अंधेरा बीच आ गया,

कदम हमारे न बड़े,

तो कहा, रास्ता ही न मिला।

न गर्जए बादल,

ना ही बरसे

न फैले वृक्ष,

ना सूके पत्ते।

ठहरा था ये समा,

पर वक्त नहीं,

ठहरे थे हम,

पर वो चलती रही।

– सुरज रुचा