इंतज़ार मत करो …

वो काफी खूबसूरत थी ।

वो काफी खूबसूरत थी,
दिल के पास थी,
इंतज़ार था,
फिर तनहा सी रात थी ।

एक शाम सा होता है,
सूरज ढल रहा होता है,
रात आने वाली होती है,
अँधेरा पास होने लगता है,
इंतज़ार मत करो ।

बातों में कड़वाहट हो,
दिलों में रंजिश हो,
पर एक कली खिल रही हो,
खिलने दो, नक़्श मिटा दो ।
इंतज़ार मत करो ।

वो आएगा फिर ।

वो आएगा फिर,
तुम साथ बैठोगे फिर,
वो हँसना मुस्कुराना होगा,
वो लड़ना झगड़ना होगा,
वो दोस्ती की बातें होंगी,
इज़हार का बहाना होगा ।
इज़हार कर दो ।
इंतज़ार मत करो ।

झिझक होगी, डर होगा,
सोच होगी, मंज़र होगा,
बिगड़ने का खतरा होगा,
पर सुनहरा सपना होगा,
ज़िक्र करने का दिल होगा,
कह देने का वक़्त होगा ।
कह दो ।
इंतज़ार मत करो ।

वो चला जायेगा ।

वो चला जायेगा,
वो वक़्त रहेगा, वो ख़ास रहेगा,
तुम तन्हा रहोगे जब वो पास रहेगा,
तुम एक रहोगे, वो चार रहेगा,
तुम नदी किनारे, वो पार रहेगा,
इश्क़ रहेगा, वो प्यार रहेगा,
तुम शेर लिखोगे, वो बेकार रहेगा,
तुम ख़ुश्क़ रहोगे, वो गुलज़ार रहेगा,
तुम ख़ामोश रहे, पर वो गुनहग़ार रहेगा ।
वो गुनहग़ार नहीं थी ।
वो खूबसूरत थी,
दिल के पास थी,
इंतज़ार था,
फिर तन्हा रात थी ।

कह दो ।

इंतज़ार मत करो ।

— रॉनी मंडल

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“दायरें”

कैसे बोले कुछ, पर चुप रह भी नहीं सकते
देखो इस महफिल की रौनक को, यहां कुछ कह भी नहीं सकते
सफेदी भरे अंधेरे में चिमनी का प्रकाश है
आंखों की नमी से, माहौल में बस थोड़ी सी खटास हैं
धुंधलाहट है, खुशबू मेहंदी की
मेरा बसेरा है यही है, यह एक ऐसा घर है जिसकी हर किसी को तलाश है
दर्द की परवाह नहीं है, पर अलगाव का मर्ज है
मेहंदी की नहीं है शायद, एक मुस्कुराहट की अर्ज है
गानों की नहीं, पर मस्ती की तर्ज है
कैसे पीलू घूंट कि सब अच्छा ही है
अंधेरा भले ही है, पर सब सच्चा ही है
चिमनी तो अन्दर भी है चश्मा साफ करके देख
रोशन तो आकाश भी है कमल उतार कर के देख
चलो चलते हैं वहां जहां अनुभव मिलता है
थोड़ी सी मुस्कान से जहां जी भरता है
जहां बातें लंबी होती है रातें नहीं
जहां समय सबके पास है पर फुर्सत नहीं
जहां मेरा नहीं है कुछ, या है कुछ, यकीन नहीं
पाया जहां बहुत कुछ है ,पर कुछ मिला नहीं
पर
सब सही है क्योंकि ना किसी जुगनू की तलाश है,ना किसी मांझी की आस है

–अक्षिता जैन

महक

“ये कहानी महक़ की है, जो पहले मुहल्ले की सबसे चुलबुली लड़की हुआ करती थी । मगर आज जब मैं काफी सालों बाद घर लौटा, तो वो बदल चुकी थी क्योंकि उस लड़की को गांव के कुछ लोगों ने जबरदस्ती औरत बना दिया था ।

जादू भरी सी थी वो,
पल में इठलाती, पल में मचलती ।
सड़क पे चलते चलते
कुछ यूँ ही फिसल जाती ।।

बेआवाज, बेखौफ जिंदगी थी उसकी,
दुनिया को कभी भी ना परखती ।
कभी सहम के बैठ जाती
कभी अचानक से हँस पड़ती ।।

उसकी हंसी किसी को सुनाई ना पड़ती,
वो भी किसी को सुन ना पाती ।
पत्थर पे बैठ आसमान को तकते
ना जाने क्या सोचती रहती ।।

उसे अब किसी से प्रेम न था
अब वो भगवान पे विश्वास भी ना करती ।
वो अब किसी के आने पे ना डरती
बस वो खुद की थी, खुद के साथ ही रहती ।।”

प्रशान्त कुमार चौरसिया

एक ग़म का दरिया है….

एक ग़म का दरिया है और मैं डुबकी लगाता जारहा हूँ।
कुछ इस तरह अपने ज़ख्मों की आग को बुझाता जारहा हूँ।

रौशनाई कम पड़ गयी है क़लम में बिखेरने को
अल्फ़ाज़ों को घसीट कर कांटे चुभाता जारहा हुँ।

यूँही नही कहलाता शायर कोई जहां में
जज़्बातों को पीरो कर मिसरे बनाता जारहा हूँ।

तमन्ना है ज़मीन से आसमान छू लेने की
हालातो की भट्टी में खुद को जलाता जारहा हूँ।

फोजैल अहमद

हम ख़ुद !!

मुंसिफ़ भी ख़ुद, गुनहगार भी ख़ुद ,
कमज़र्फ भी ख़ुद, रसूख़दार भी ख़ुद

कभी बेकार फिरते हैं, कभी कायनात हमसे है ,
मसरूफ़ ज़ुमा हम ख़ुद, फ़िज़ूल इतवार भी ख़ुद ॥

कुछ मांग लूं दर से, या लौट जाऊं हाथ खाली ,
आज आबिद भी ख़ुद, परवरदिगार भी ख़ुद ॥

कहाँ चादर चढ़ा आएं, कहाँ ढूंढें ख़ुदा को हम ,
मक्का मदीना भी ख़ुद, पाक़ मज़ार भी ख़ुद ॥

कहो ख़रीद लूं जहां, कहो नीलाम हो जाऊं ,
मुफ़लिस फ़क़ीर भी ख़ुद, नफ़ीस शहरयार भी ख़ुद ॥

मिज़ाज़-ए-हयात, अब कुछ ठीक नहीं लगता ,
हम हक़ीम भी खुद, बेबस बीमार भी ख़ुद ॥

– अभिषेक कुमार मिष्रा

“बिला उन्वान”

ये हृदय अस्मिता के अस्मिता से सौ बार हारा
एक हठ को ज़ुबाँ के बंद द्वारे फिर पटक मारा

हसरतों की चिता रखकर
उसे ख़ुद ज्वाला दिखाई
आप ही अस्थियाँ चुनकर
उसी से मंदिर बनाई

हमन को तो क्षतचिह्न से उद्धृत नक्शे का सहारा
हमन ने चल उसी पर आँसुओं का काबा निहारा

पीड़ से जोड़ इक माला
उसी बुत पर जा चढ़ाया
फ़ातिहा पढ़ हरे ग़म का
ग़मों को म्लानी बनाया

एक दिन चल दिया ऐकल मिला सागर का किनारा
वो वृद्ध साधु बोला प्रीत की चुन लो पाक धारा

हाथ आई किरण धारा
चुना उसने रंग धानी
प्रीत से प्रीत बुनकर तब
बनी एक मर्म कहानी

जी लिया वो तत्व में परितृप्त जीवन का शरारा
बुझ गये सब नज़ारे बस बचा ये श्यामल नज़ारा

कुमार अंकेश

दो लफ्ज़

अपनी सोच को तहजीब सिखा रहा हूँ,
दो लफ्ज़ लिखने की कोशिश कर रहा हूँ..

युं तो अल्फाजों की बहोत कमी है मेरे पास,
जज्बातों से ही सही
काम चला रहा हूँ..

माना की वो नमक मेरे लिखावट मे नहीं,
पर लफ्ज़ो की मिलावट मेरे फितरत मे भी नहीं..

काश दर्द के भी दुकाने लगतीं इन बाजारों मे,
तो मेरे जैसा सौदागर
इन्हे कहीं मिलता ही नही..

– आसिम मुलानी

सन्नाटा

सन्नाटा चारो ओर छाया हुआ,

खाली ये सुनसान गगन,

साया भी जब शोर करे,

तब थमा है सब यहां।

थम सा गए ये हम,

पर नहीं वो भी,

थम सा गया है सब यहां,

पर वक्त है चलता रहा।

नूर उसकी आखों का यू तेज़,

पर काले बादल अब भी छा ए,

पुकार तो रही थी हर कहीं से वो हमें,

पर सन्नाटे में हम कहा कुछ सुन पाए।

लगाई थी जब उसने पुकार,

कदमों का हुआ शोर विक्रल,

देख तो वो हमे भी रही थी,

पर अंधेरे में हम कहा कुछ देख सके।

देखी जब वो हमे,

तो अंधेरा बीच आ गया,

कदम हमारे न बड़े,

तो कहा, रास्ता ही न मिला।

न गर्जए बादल,

ना ही बरसे

न फैले वृक्ष,

ना सूके पत्ते।

ठहरा था ये समा,

पर वक्त नहीं,

ठहरे थे हम,

पर वो चलती रही।

– सुरज रुचा

नम आँखें

उसकी नम आँखों को देखकर, मेरेदिल में ख्याल आया है
क्या किसी ने उसको रुलाया है, या कोई पुराना राज फिर उसे याद आया है॥

लगता है कि कोई राज है,

उसमें छुपी मेरी आवाज है

आवाज जो पहले उसे बहुत हँसाती थी,

कानों में उसके एक नयी खनक को छोड़ जाती थी

बीते पलों में एक नए खूबसूरत पल को जोड़ जाती थी,

एक नए राज को उसके दिल में छोड़ जाती थी

परन्तु अब आवाज वही उसको बहुत रुलाती है,

उसके बेचैन दिल को और भी बेचैन कर जाती है

सीने में दबे सैलाब को आँखों तक ले आती है,

उसकी नम आँखों को और भी नम कर जाती है

उसकी नम आँखों को देखकर, मेरेदिल में ख्याल आया है
क्या किसी ने उसको रुलाया है, या कोई पुराना राज फिर उसे याद आया है॥

लगता है कि कोई सुनहरे कल की याद है,

याद में छिपी मेरी कोई फ़रियाद है

फरियाद जिसको उसने पहले ठुकराया था,

फिर दिल में अपने कभी उसने चैन ना पाया था

तब भले ही उसने मुझको ठुकराया था,

तब भले ही उसने मुझको गैर बनाया था।

लेकिन आज मैं उसके बीते पलों की याद हूँ,

सुनहरे कल में छुपे राजों की फ़रियाद हूँ

अब ये यादें उसको बहुत रुलाती हैं,

उसकी नम आँखों को और भी नम कर जाती हैं॥

उसकी नम आँखों को देखकर, मेरेदिल में ख्याल आया है

क्या किसी ने उसको रुलाया है, या कोई पुराना राज फिर उसे याद आया है॥

लगता है कोई बीता पल है ,

उसमें छुपा हमारा कोई कल है॥

वो रोए तो बहुत पर मुझसे मुंह मोड़ कर रोए,

कोई तकलीफ होगी जो दिल तोड़ कर रोए

मेरे सामने कर दिए मेरी तस्वीर के टुकड़े,
पता लगा मेरे पीछे वो उन्हे जोड़ कर रोए॥

दीपांशु शर्मा

रुख़सत

इक भीड़ है तन्हा लोगों की

कुछ खोई-खोई रहती है।

एक नाम है तन्हा लोगों का

वो शायर-शायर कहती है।

इक उम्र है तन्हा लोगों की

कुछ बड़ी पुरानी लगती है।

आवाज़ है तन्हा लोगों की

कुछ नमक का पानी लगती है।

इक गुण है तन्हा लोगों का

वो तन्हा तन्हा रहते हैं।

कुछ बात छुपा कर रखी है,

लेकिन हर बार मुकरते हैं।

इक प्रश्न है तन्हा लोगों का

बस हम ही तन्हा कैसे हैं।

एक गूंज है तन्हा लोगों की

अब हम तन्हा ही अच्छे हैं।

महफिल है तन्हा लोगों की

अब रुखसत होने वाली है।

इक भीड़ है बैठी छोटी सी

महफिल की अगली पारी है।

– आकाश प्रताप सिंह